Home Bilaspur शहर ही नहीं, संस्कृति भी डूबी गोबिंदसागर झील में

शहर ही नहीं, संस्कृति भी डूबी गोबिंदसागर झील में

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History of District Bilaspur Himachal Pradesh

9 अगस्त 1961 को गोबिन्द सागर झील में डूबा था पुराना बिलासपुर शहर। यह शहर कहलूर रियासत की राजधानी था । कहलूर रियासत के एक महा प्रतापी राजा दलीपचंद ने इस शहर को अपनी राजधानी के रूप में बसाया था । उसने धौलरा में अपने महल बनावाए थे और नीचे की तरफ शहर बसाया था । झील में डूबे उस शहर को लेकर लेखकों, कवियों ने अपनी कलम से बहुत कुछ साहित्य जगत को अर्पित किया है। बिलासपुर के दिबंगत विधायक एड्वोकेट दीनानाथ पंडित की कविता “9 अगस्त की शान तथा विमल कृष्ण अष्ट” की कविताएं मन मोह लेती हैं । एक शहर पुराना सा शीर्षक से कवि मैनें कविता लिखी थी जिसकी पंक्तियां हैं-

मंदिर, शिवालय , कुं ओं व स्नानागारों का ,
बड़ा अद्धभुत था वह एक शहर पुराना सा,
पंछी थे कलरव करते बूढ़े पेड़ों पर बांसों के बिहड़ों पर,
एक नदिया भागती शोर मचाती, पीछे छोड़ जाती मछुवारों के जालों को,
अचानक किस्मत ने पलटा खाया,
खंड-खंड हुआ वह एक शहर पुराना सा,
सतलुज बनी गोबिन्द सागर,
कैसा हुआ यह परिवर्तन। बड़ा………।
इस बार भी 9 अगस्त आएगा। पुरानी याद ताजा करवाएगा।

10 दिसंबर, 1961 को भाखड़ा बांध के उद्घाटन अवसर पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री दिवंगत जवाहर लाल नेहरू ने भाषण देते हुए इस बांध को भारत का आधुनिक मंदिर कहा था। उन्होंने कहा था कि इससे हमारे देश में खुशहाली आएगी। नेहरू का सपना सच हुआ। भाखड़ा बांध के बनने से सचमुच देश में खुशहाली आई। गोबिंदसागर झील में भारी मात्र में मछली का उत्पादन होना शुरू हो गया। मछुआरों की तकदीर बदल गई लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। 1भाखड़ा बांध के निर्माण के लिए ऐतिहासिक बिलासपुर को झील में डूबना पड़ा। विकास के लिए विनाश को भी ङोलना पड़ा है। वह संस्कृति के लुप्त होने का विनाश है। बिलासपुर की गौरवमयी संस्कृति भी गोबिंदसागर झील में डूबी है।

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शायरों, कवियों, लेखकों ने औरंगजेब के समकालीन कहलूर नरेश दीप चंद के बसाए उस बिलासपुर शहर के भाखड़ा बांध के निर्माण के लिए जल समाधि लिए जाने को लेकर खुलकर लिखा है।

बिलासपुर के पूर्व विधायक व शायर दिवंगत पंडित दीनानाथ ने अपनी एक नजम में इस दर्द को यूं बयान किया है, ‘बढ़ चला सतलुज का पानी बढ़ चला। जिस जगह पर व्यास ने डंका बजाया ज्ञान का, और फिर शुकदेव ने आसन जमाया ध्यान का, ऐ वतन वह सरजमी अब तेरे अर्पण हो गई’। एक दूसरी नजम नौ अगस्त की शाम में वे लिखते है वह ‘बढ़ने लगी बांध की शोखियां, वह सतलुज मेरा हड़बड़ाने लग, मचा गुल शहर में तू चल भाग चल, वह आने लगा पानी आने लगा’।

वास्तव में एक शहर का विशाल जलाशय में डूबना मात्र मिट्टी, गारे, ईंट पत्थर के घरों का डूबना नही होता है। उस शहर का डूबना एक संस्कृति का डूबना था। गोबिंदसागर झील में कहलूर रियासत का, रंग महल व नया महल ही नही डूबे बल्कि उनसे भी पुराने महल, शिखर शैली के 99 मंदिर, स्कूल कालेज, पंजरुखी नालयां का नौण, दंडयूरी, बांदलिंया, गोहर बाजार, सिक्खों का मुड में गुरुथान, गोपाल जी का मंदिर और साथ में कचहरी परिसर भी डूबा। नौ अगस्त 1961 को पहली बार भाखड़ा बांध का जलस्तर बढ़ा तो बिलासपुर शहर डूबता चला गया।

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दिवंगत विधायक व शायर पंडित दीनानाथ ने उस समय का चित्र अपने शब्दों से खींचते हुए लिखा है- थी छाई बरसात की स्याह घटा, पपीहा था मलहार गाने लगा। सच उस झील में डूबे शहर की हर बात निराली थी। वीरवार को खाखी शाह की मजार पर हिंदू मुसलमान इक्ट्ठे होकर वहां मीठा चूरमा चढ़ाते और एक दूसरे को बांटते थे। वहीं खाखी शाह परिसर में शायरों की महफिलें सजती थीं। गजलों, कबालियां, ढुमरियों के दौर चलते। रियासत काल में झील में डूबे बिलासपुर शहर के लोगों ने सैर के त्यौहार पर सांढू में राजा का दरबार सजता देख। उस शहर की अजब संस्कृति थी। दिवाली पर बच्चे घास फूस के घेरसू कोई बीस दिन पहले ही जलाना शुरू कर देते थे। लड़कियां चेहरे पर टिकू बिंदू लगाकर गीत गाती हुई आस पड़ोस में शाम को निकल जाती थीं। अब नए बिलासपुर शहर में वह बात ही नही रही है। पुरानी संस्कृति लुप्त हो चुकी है जैसे सब कुछ गोबिंदसागर झील में डूब चुका है।

बिलासपुर कालेज के साठ के दशक के अंग्रेजी के प्राध्यापक व शायर बिमल कृष्ण अश्क की लेखनी से तभी ये नजम कागज पर उकेरी गई होगी – अब इस बस्ती के लोगों में पहले जैसी बात नही, चेहरों पर लजीली सुबह नही, आंखों में नशीली रात नही, पीपल में झूला नही रहा, चरखों की चर्र-चर्र डूब गई। गोबिंदसागर झील में नौ अगस्त 1961 को ऐतिहासिक नगर बिलासपुर ही नही डूबा था बल्कि दर्जनों बाग बागीचे, सार्वजनिक स्नानागार, पनघट, हार घराट सब डूबे थे। झील में डूबे उस शहर की संस्कृति भी एक और विशेष झलक यह थी कि साव महीने में घर घर छोटे छोटे बच्चों को झूलने के लिए पींग किसी पीपल या आम के पेड़ की टहनी में डाल दी जाती थी। बड़ी आयु के लोग इस परंपरा को अच्छी तरह निभाते थे । इस पींगा दा महीना कहा जाता था। रक्षाबंधन से कोई बीस दिन पहले घर घर मशीन से सवेइयां तैयार की जाती थी। यदि मुहल्ले में किसी के पास मशीन होती तो बारी बारी सब के घर सेवियां बनाने के लिए जाती थी। यह सब कुछ उसी दिन समाप्त हो गया था जब पुराना बिलासपुर शहर गोबिंदसागर झील में डूबा था। साठ साल के ऊपर वालों को आज भी पुरानी यादें ताजा करते हुए सुना जा सकता है।

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